
मतदान का अधिकार भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। चुनाव आयोग पारदर्शिता सुनिश्चित करता है और संविधान हर नागरिक को यह अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने हाल ही में बिहार में मर चुके और हटाए गए मतदाताओं की सूची को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस पैदा की है।
मामला क्या है?
बिहार में मतदाता सूची पर लंबे समय से बहस चल रही थी। विपक्षी दल ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में मृत लोगों के नाम हैं, जो चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता को चुनौती देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग को कहा कि बिहार में हटाए गए 65 लाख मतदाताओं की पूरी सूचना दी जाए।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची को पारदर्शी बनाए रखना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने पर जनता को स्पष्ट होना चाहिए कि किन कारणों से ऐसा किया गया था।
कोर्ट की मुख्य बातें:
1. जनता को सूचना देने का अधिकार सभी को मतदाता सूची, जो सार्वजनिक दस्तावेज है, में किए गए बदलावों का पता होना चाहिए।
2. मर चुके मतदाताओं की सूची को साझा करना: जनता और राजनीतिक दल दोनों को यह जानकारी होनी चाहिए।
3. डिजिटल पारदर्शिता वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर सूची होनी चाहिए।
चुनाव आयोग का बयान
कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए चुनाव आयोग ने कहा कि बिहार में हटाए गए मतदाताओं की सूची राजनीतिक दलों को दी गई है। ताकि चुनाव में कोई गड़बड़ी न हो, संस्था ने बताया कि सूची को नियमित रूप से अपडेट किया जाता है।
आयोग की दलीलें:
नियमित अंतराल पर मतदाता सूची की जांच की जाती है। मृत लोगों, स्थानांतरित मतदाताओं और फर्जी नामों को हटाना चाहिए। इस प्रक्रिया से निष्पक्ष निर्णय होते हैं।
65 लाख नाम हटाने की वजह
इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के पीछे मुख्य कारण हैं:
1. मर चुके मतदाताओं के नाम: ये नाम सूची में बने हुए हैं, हालांकि वे मर चुके हैं।
2. स्थान परिवर्तन: जो मतदाता एक राज्य या जिले से दूसरे में स्थानांतरित हो गए हैं।
3. डुप्लीकेट नाम: एक व्यक्ति का एक से अधिक बार नाम दर्ज होना
4. गलत पते या दस्तावेज़: पते की पुष्टि नहीं होने पर नाम हटाया गया।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
विपक्ष का आरोप
विरोधी पक्ष का कहना है कि यह कदम मतदाताओं को दूर करने की साजिश है, ताकि चुनावी लाभ प्राप्त किया जा सके। उनका दावा है कि बहुत से वास्तविक मतदाताओं के नाम भी गलत तरीके से निकाले गए।
सत्ताधारी दल का जवाब
सत्ताधारी पक्ष ने इसे चुनाव आयोग की पारदर्शी प्रक्रिया बताया और साफ-सुथरे चुनाव के लिए आवश्यक बताया।
बिहार की राजनीति पर असर
बिहार में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदाता सूची बहुत महत्वपूर्ण है। 65 लाख नामों को हटा देने से कई सीटों के समीकरण बदल सकते हैं, खासकर ग्रामीण इलाकों में, जहां मतदान प्रतिशत हमेशा ऊंचा रहता है।
मतदाताओं के लिए ज़रूरी कदम
अगर किसी मतदाता का नाम सूची से हटा दिया गया है, लेकिन वह जीवित और योग्य है, तो वह निम्नलिखित तरीकों से अपना नाम फिर से प्राप्त कर सकता है:
- 1. फॉर्म-6 भरना – नया नाम जोड़ने के लिए।
- 2. फॉर्म-8 भरना – विवरण संशोधित करने के लिए।
- 3. ऑनलाइन आवेदन – राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल (NVSP) पर।
- 4. बीएलओ से संपर्क – अपने क्षेत्र के बूथ लेवल ऑफिसर से।
पारदर्शिता की अहमियत
लोकतंत्र के लिए पारदर्शिता आवश्यक है, क्योंकि इससे जनता का चुनावी प्रक्रिया में विश्वास बना रहता है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय देश भर में पारदर्शिता को बढ़ा देगा।

चुनाव विशेषज्ञों का मत है कि इतनी बड़ी संख्या में नामों को हटाना सही है केवल तब जब यह पूरी तरह से साक्ष्यों पर आधारित है। वे यह भी कहते हैं कि अगर किसी व्यक्ति का नाम सूची से हटाया जाता है, तो चुनाव आयोग को हर नागरिक को SMS, ईमेल या पोस्ट के माध्यम से सूचित करना चाहिए।
निष्कर्ष
बिहार में मृत और हटाए गए मतदाताओं की सूची का मुद्दा देश भर में चुनावी पारदर्शिता का प्रतीक है। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की कार्रवाई से आगे ऐसे विवाद कम होंगे और मतदाताओं का भरोसा बढ़ेगा।
लेखक के बारे में
Sunny Mahto, डिजिटल मीडिया कंटेंट क्रिएटर और govyojna.de इंस्टाग्राम पेज के एडमिन, जो सरकारी योजनाओं, शिक्षा और समाचार पर विश्वसनीय व ताज़ा जानकारी साझा करते हैं। आप मुझे फेसबुक पेज Trading is Sunny पर भी फॉलो कर सकते हैं।