
बिहार में विधान सभा चुनावों को लेकर बिहार उप मुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने अपने बिहार के जिला लखीसराय के विधायक से जा के मिले जिन्होंने क्या क्या बात किए हम इस पोस्ट में जानेंगे पूरी जानकारी के लिए आप पोस्ट के लास्ट तक बने रहे धन्यवाद
बिहार की राजनीति में कई विधानसभा सीटें अहम भूमिका निभाती हैं, लेकिन लखीसराय उन चुनिंदा सीटों में से एक है, जो न सिर्फ जातीय समीकरण, बल्कि राजनीतिक रणनीति के लिहाज़ से भी चर्चा में रहती है। 2025 के विधानसभा चुनाव में यहां का मुकाबला बेहद दिलचस्प हो चुका है, जहां एक ओर भाजपा नेता विजय सिन्हा अपनी चौथी जीत की तैयारी में हैं, वहीं दूसरी ओर समाजवादी और अन्य विपक्षी ताकतें उन्हें रोकने के लिए एकजुट हो रही हैं।
विजय सिन्हा की हैट्रिक का इतिहास:
लखीसराय सीट पर भाजपा के विजय सिन्हा ने लगातार तीन बार चुनाव जीता है (2010, 2015, 2020)। उनकी लोकप्रियता का कारण न सिर्फ उनकी संगठनात्मक पकड़ है, बल्कि क्षेत्र में सड़क, बिजली, शिक्षा और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर काम भी माना जाता है। वो विधानसभा के स्पीकर भी रह चुके हैं और भाजपा के लिए एक मजबूत चेहरा माने जाते हैं।
समाजवादियों की गढ़ में भाजपा की मजबूत पकड़
हालांकि लखीसराय को परंपरागत रूप से समाजवादी विचारधारा का गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन पिछले एक दशक में यहां भाजपा ने मजबूत जनाधार बनाया है। जहां एक समय में यहां राजद और जदयू का दबदबा था, अब वहां भाजपा की पकड़ दिख रही है।
2025 में क्या है चुनौती?:
2025 में विजय सिन्हा को कई मोर्चों पर चुनौती मिल रही है:
1. एंटी इनकंबेंसी फैक्टर – लगातार तीन बार जीत के बाद जनता में बदलाव की मांग बढ़ी है।
2. महागठबंधन का दबाव – RJD, कांग्रेस और वाम दलों का संभावित गठबंधन भाजपा के लिए चिंता का विषय है।
3. स्थानीय असंतोष – कुछ क्षेत्रों में बिजली, पानी, सड़कों और बेरोज़गारी को लेकर जनता में नाराज़गी है।
4. नवयुवक वोटर – युवा मतदाता नए चेहरे की मांग कर सकते हैं।
बिहार में विपक्ष के भी गजब कहानी है
राजद, कांग्रेस और लेफ्ट दल इस बार पूरी रणनीति के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक:
राजद एक मजबूत पिछड़े वर्ग के उम्मीदवार को मैदान में उतार सकता है।
कांग्रेस स्थानीय नेता को उतारकर मुस्लिम-यादव समीकरण को साधना चाहती है।
वामपंथी दल शिक्षा और बेरोजगारी को मुख्य मुद्दा बना रहे हैं।
बिहार में चुनाव हो और जाती को लेकर विवाद नहीं हो ऐसा हो ही नहीं सकता हैं बिहार में जाती को लेकर बहुत धांधली की सामना किया जाता हैं
लखीसराय की राजनीति जातीय समीकरणों पर काफी हद तक निर्भर करती है। यहां भूमिहार, यादव, कुशवाहा, मुस्लिम और सवर्ण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। विजय सिन्हा भूमिहार समुदाय से आते हैं, जबकि राजद पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय पर फोकस करता है।
बिहार में कांग्रेस की क्या पकड़ है आइए जानते हैं
कांग्रेस की कमजोर पकड़:
लखीसराय में कांग्रेस को सिर्फ एक बार ही जीत मिली है। हालांकि पार्टी 2025 में खुद को दोबारा स्थापित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन संगठनात्मक कमजोरी और उम्मीदवार चयन में देरी अब भी चुनौती बनी हुई है।
इस बार चुनाव विकास के दावे और जमीनी हकीकत के बीच हो सकता है। भाजपा जहां अपने कार्यकाल में हुए कार्यों को दिखाएगी, वहीं विपक्ष शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उछालेगा।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यदि विपक्ष एकजुट होकर एक ही उम्मीदवार के पीछे खड़ा होता है, तो विजय सिन्हा की राह मुश्किल हो सकती है। लेकिन अगर विपक्ष में सीट को लेकर बिखराव हुआ, तो भाजपा को फिर से बढ़त मिल सकती है।

लखीसराय विधानसभा सीट 2025 का चुनाव सिर्फ एक आम चुनाव नहीं, बल्कि बिहार की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने वाला मुकाबला होगा। विजय सिन्हा की हैट्रिक को चुनौती देना किसी भी दल के लिए आसान नहीं है, लेकिन अगर विपक्ष रणनीति से काम लेता है, तो मुकाबला बहुत दिलचस्प हो सकता है।
एनडीए बैठक में भाजपा और जदयू नेताओं के बीच हुई तीखी बहस, जिसमें विजय सिन्हा ने स्थानीय भाजपा विधायक को बाहर किए जाने पर आपत्ति जताई। जदयू के अशोक चौधरी की ओर से इसका बचाव किया गया, लेकिन गठबंधन में सख्ती के सवाल उठे।
विजय सिन्हा अब बिहार सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं, जो राज्य में भाजपा की निर्णायक भूमिका को दर्शाता है।
अगर विपक्ष सही रणनीति अप नाये और एक मजबूत प्रत्याशी उतारे, तो विजय सिन्हा की चौथी जीत पर सवाल उठ सकता है। वर्ना भाजपा फिर हावी होती नज़र आ सकती है।