
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव भारत का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यह चुनाव आयोग (Election Commission of India) की जिम्मेदारी है कि चुनाव पारदर्शी, निष्पक्ष और संविधान के सिद्धांतों के अनुरूप हों। इस संस्था का नेतृत्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) करते हैं, जिनकी भूमिका प्रशासनिक और लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा करने में बहुत महत्वपूर्ण है।
हाल ही में, कई विपक्षी पार्टियों ने मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर आरोप लगाया कि वे स्वतंत्र चुनावों में असफल रहे हैं और सत्तारूढ़ दल (भाजपा) के प्रवक्ता की तरह काम कर रहे हैं। विपक्षी पार्टियों ने यहां तक कहा कि वे महाभियोग की कार्रवाई पर विचार कर सकते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना वास्तव में संभव है? यदि ऐसा होता है, तो उसकी संवैधानिक प्रक्रिया क्या होती है? आइए इसे पूरी तरह से समझें।
चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका
संविधान का अनुच्छेद 324 भारत का चुनाव आयोग को एक संवैधानिक संस्था बनाता है। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है— लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा चुनाव कराना। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति
चुनाव की प्रक्रिया चुनाव प्रक्रिया की देखभाल करना आदर्श आचार संहिता का पालन करना।
राजनीतिक दलों को मान्यता देना और उनके लिए चुनाव चिह्न (Symbol) देना आयोग का सर्वोच्च
पदाधिकारी मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) होता है। उनके साथ चुनाव आयुक्त भी होते हैं।
कुल मिलाकर, यह निकाय भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कैसे होती है?
साल 2023 में लागू हुआ अधिनियम (Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023) ने चुनाव प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया। भारत के राष्ट्रपति इसे नियुक्त करता है। इसके लिए एक चयन समिति (Selection Committee) होती है, जिसमें
1. राष्ट्रपति
2. लोकसभा में विपक्ष का नेता
3. संघीय मंत्रिमंडल का एक सदस्य
राष्ट्रपति, इस समिति की सिफारिश पर नियुक्ति करते हैं। नियुक्त व्यक्ति चुनाव प्रशासन और प्रबंधन में काफी अनुभवी सचिव स्तर के
अधिकारी होते हैं। कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक चलता है, जो भी पहले हो।
क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना संभव है?
यह सबसे महत्वपूर्ण और महत्वपूर्ण प्रश्न है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) में कहा गया है कि— सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीश को पद से हटाने की प्रक्रिया और आधार केवल उसी है।
महाभियोग प्रक्रिया है। विशेष बहुमत (Special Majority) से संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में प्रस्ताव पारित होने के बाद ही राष्ट्रपति उन्हें पद से हटा सकते हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना, कोई अन्य चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त अपने पद से हटाया नहीं जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया क्या है?
CEC को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह है, इसलिए इसे समझना महत्वपूर्ण है—
1. संसद के किसी भी सदन में महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है।
2. प्रस्ताव लाने से पहले सौ या पच्चीस राज्यसभा या लोकसभा सांसदों का समर्थन आवश्यक है।
3। एक बार प्रस्ताव स्वीकृत होने पर मामले की जांच के लिए जजों की एक समिति बनाई जाती है।
4। संसद में मतदान कराया जाता है अगर समिति यह पाती है कि व्यक्ति पर लगे आरोप (जैसे दुर्व्यवहार, भ्रष्टाचार या अक्षमता) सही हैं।
5. प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में 2/3 बहुमत या विशेष बहुमत मिलना चाहिए।
6: राष्ट्रपति इसके बाद ही पद से हटा सकते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना एक जटिल और लंबी प्रक्रिया है, जो आसान नहीं है।
विपक्ष के आरोप और मौजूदा विवाद
हाल ही में आठ विपक्षी दलों (कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल) ने CEC ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए। उनका दावा है कि चुनाव आयोग ने निष्पक्ष चुनाव नहीं कराया।
विपक्ष ने कहा कि CEC ने BJP के प्रवक्ता की तरह व्यवहार किया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि महाभियोग प्रस्ताव सहित सभी कानूनी विकल्पों पर विचार हो रहा है।
विपक्ष का कहना है कि आयोग ने आचार संहिता के उल्लंघन, EVM की पारदर्शिता और मतदाता सूची से नाम हटाने के बारे में कुछ भी नहीं किया।
क्यों है यह मुद्दा अहम?
भारत का लोकतंत्र मजबूत हो सकता है जब सभी दल चुनाव आयोग पर समान भरोसा करते हैं। अगर CEC की निष्पक्षता का प्रश्न उठता है तो— चुनाव की वैधता पर सवाल उठता है।
लोकतांत्रिक संस्थाओं को प्रभावित करता है। जनता और विपक्ष दोनों का भरोसा कमजोर हो गया है।
क्या वास्तव में हटाया गया है कभी कोई CEC?
भारत के इतिहास में आज तक किसी भी प्रमुख चुनाव आयुक्त को महाभियोग के जरिए पद से हटाया गया नहीं है। लेकिन कुछ मौकों पर बहस जरूर हुई है, जैसे— TN शेषन (1990 के दशक)—
उनके कठोर कदमों ने सरकार और विपक्ष दोनों को परेशान कर दिया, लेकिन उन्हें हटाया नहीं गया। कुछ अन्य चुनाव आयुक्तों पर भी पक्षपात और दबाव के आरोप लगे, लेकिन संवैधानिक सुरक्षा के कारण वे पद पर बने रहे।
संवैधानिक सुरक्षा क्यों दी गई?
CEC और EC को हटाना इतना कठिन बनाया गया था क्योंकि संसद या सरकार उन पर राजनीतिक दबाव नहीं डाल सकती थी। वे पूरी स्वतंत्रता से चुन सकते हैं। लोकतंत्र में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनी रहती हैं।
निष्कर्ष
भारत का लोकतंत्र मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका से जुड़ा हुआ है। विपक्षी दलों के आरोपों ने बहस पैदा की है, लेकिन संविधान और 2023 का नया कानून दोनों CEC को सुरक्षित रखते हैं। उन्हें सिर्फ उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जिससे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया गया है,
जो बहुत कठिन और दुर्लभ है। CEC को हटाना असंभव है अगर संसद में व्यापक सहमति और ठोस सबूत नहीं हैं। यही कारण है कि महाभियोग अब तक किसी भी CEC को पद से हटाया नहीं गया है।
लोकतंत्र में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष रहे और लोगों का विश्वास बरकरार रहे।
(About the Author)
Sunny Mahto एक युवा ब्लॉगर और कंटेंट क्रिएटर हैं, जो रिसर्च-आधारित लेख लिखते हैं जो सरकारी योजनाओं (Sarkari Yojana), शिक्षा (Education) और राजनीति (Politics) से जुड़े हैं।
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