
बिहार में चुनाव को लेकर बहुत पार्टी आवाज उठा रही हैं तो आज के इस पोस्ट में हम जानेंगे कि सुप्रीम कोर्ट ने क्या बयान दिया है
✅ भूमिका: वोटर आईडी और आधार लिंकिंग का विवाद
भारत में चुनावों की पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए कई बार सरकार और चुनाव आयोग द्वारा नई पहलें की जाती रही हैं। इन्हीं में से एक है वोटर आईडी को आधार से लिंक करने की प्रक्रिया। लेकिन यह पहल सिर्फ तकनीकी नहीं है, यह नागरिकों के मानवाधिकारों और निजता (Privacy) से भी जुड़ी हुई है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को लेकर गंभीर टिप्पणी की और चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है।
आधार और वोटर आईडी लिंक करने की योजना
2015 में सरकार ने आधार को वोटर कार्ड से जोड़ने का प्रयास किया था, जिसका उद्देश्य था:
डुप्लिकेट वोटर आईडी हटाना
फर्जी वोटिंग रोकना
चुनाव प्रणाली को पारदर्शी बनाना
लेकिन इसके साथ ही यह चिंता भी उठी कि इससे निजता का उल्लंघन होगा और वोट देने का मौलिक अधिकार (Fundamental Right to Vote) प्रभावित हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: मानवाधिकारों की सुरक्षा ज़रूरी
सुप्रीम कोर्ट को कहना है कि अगर कोई भी व्यक्ति अपने वोटर आईडी कार्ड को आधार से नहीं जोड़ता है तो उन्हें वोट देने से वंचित किया जायेगा
चुनाव आयोग की सफाई:
चुनाव आयोग का कहना है कि:
आधार लिंक करना फर्जी मतदाता पहचान रोकने के लिए है।
यह प्रक्रिया स्वैच्छिक है, न कि अनिवार्य।
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वस्त किया है कि किसी भी नागरिक को वोट देने से नहीं रोका जाएगा।
मानवाधिकार आयोग की चिंता:
निजता (Privacy) का अधिकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) घोषित किया जा चुका है।
आधार डेटा से जुड़ी सूचनाएं लीक होने की कई घटनाएं पहले हो चुकी हैं।
हर व्यक्ति को बिना किसी बंधन के अपने मताधिकार का उपयोग करने का अधिकार होना चाहिए।
क्या होगा ये सब कर लाभ और फायदे
फर्जी वोटर हटेंगे निजता का हनन
पारदर्शिता बढ़ेगी डेटा लीक का खतरा
डुप्लिकेट वोटिंग रुकेगी तकनीकी समस्याएं
चुनाव आयोग को चाहिए कि सभी राज्यों को स्पष्ट निर्देश दे कि यह प्रक्रिया स्वैच्छिक है।
आम नागरिकों को जागरूक किया जाए कि उनका वोट देने का अधिकार किसी भी परिस्थिति में सुरक्षित है।
डेटा सुरक्षा कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए ताकि नागरिकों का विश्वास बना रहे।

आधार और वोटर आईडी लिंकिंग तकनीकी सुधार हो सकता है, लेकिन यह सुधार नागरिकों के मौलिक अधिकारों को ताक पर रखकर नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने सही समय पर इस विषय पर ध्यान दिया है और एक सशक्त लोकतंत्र में हर नागरिक की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए — चाहे उसने आधार लिंक किया हो या नहीं।