
बिहार में चुनाव को लेकर फिर से हलचल मची हुई है आज के खबरों में फिर से सरकार की भूमिका उमर कर आ रही हैं आइए जानते हैं बिहार आइए जानते हैं डिटेल में बिहार की आज की खबरें क्या बोला है तेजस्वी यादव की विचार
बिहार की राजनीति में इन दिनों बड़े बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। जहां एक ओर महागठबंधन में अंतर्कलह की बातें सामने आ रही हैं, वहीं दूसरी ओर एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) अपनी रणनीति को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसी कड़ी में खबर है कि NDA ने तेजस्वी यादव के ‘करीबी’ माने जाने वाले नेता और हम (हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) पार्टी के अध्यक्ष संतोष सुमन को गठबंधन में शामिल होने का प्रस्ताव दिया है — और वो भी 60 सीटों की बड़ी पेशकश के साथ।
यह प्रस्ताव ना केवल चुनावी रणनीति की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, बल्कि बिहार की जातिगत राजनीति, नेतृत्व की प्राथमिकताएं और गठबंधन की मजबूती पर भी व्यापक असर डाल सकता है।
संतोष सुमन का NDA को प्रस्ताव: क्या होगा फैसला?
हम पार्टी के अध्यक्ष संतोष सुमन ने साफ तौर पर कहा है कि उन्होंने वीआईपी (विकासशील इंसान पार्टी) प्रमुख मुकेश सहनी को एनडीए में शामिल होने का आमंत्रण दिया है। उनका मानना है कि एनडीए ही सहनी और उनके समुदाय के लिए बेहतर मंच साबित हो सकता है।
उन्होंने यह भी संकेत दिए हैं कि तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन में दलितों और अल्पसंख्यकों को केवल वोट बैंक की तरह देखा जाता है, जबकि नेतृत्व की जिम्मेदारी देने से बचा जाता है। ऐसे में उनका रुझान एनडीए की ओर बढ़ना स्वाभाविक दिखता है।
60 सीटों की डील: क्या है इसके मायने?
सूत्रों के अनुसार, एनडीए ने हम पार्टी को 60 विधानसभा सीटों की पेशकश की है। यह अपने आप में बड़ा और महत्वपूर्ण प्रस्ताव है, क्योंकि अब तक की राजनीति में इतनी सीटें क्षेत्रीय दलों को देना असामान्य रहा है।
यदि यह डील फाइनल होती है, तो इससे महागठबंधन के वोट बैंक में सीधा असर पड़ेगा, खासकर दलित और पिछड़ा वर्ग के वोटों पर। दूसरी ओर एनडीए को एक नया जातिगत समीकरण मिलेगा, जो तेजस्वी यादव की रणनीति को कमजोर कर सकता है।
चिराग पासवान का विकल्प या दबाव?
संतोष सुमन ने बयान में यह भी कहा कि अगर चिराग पासवान केंद्र की जिम्मेदारियों से पीछे हटते हैं, तो वह बिहार में नेतृत्व देने को तैयार हैं। हालांकि उन्होंने यह बात संभावनाओं में कही, लेकिन इससे यह स्पष्ट होता है कि एनडीए के भीतर भी दलित नेतृत्व को लेकर विकल्प खुले हुए हैं।
सुमन का यह बयान चिराग पासवान पर परोक्ष दबाव की तरह देखा जा रहा है कि या तो वे पूरी तरह एक्टिव हों या फिर नेतृत्व को नए चेहरे के लिए खुला छोड़ें।
महागठबंधन पर सवाल: क्या कांग्रेस और राजद देंगे दलित को नेतृत्व?
संतोष सुमन का यह आरोप भी अहम है कि राजद और कांग्रेस सिर्फ दलित और अल्पसंख्यकों का वोट लेते हैं, लेकिन कभी उन्हें नेतृत्व की भूमिका नहीं देते। उन्होंने पूछा कि आखिर क्यों अभी तक किसी दलित या मुस्लिम को महागठबंधन की तरफ से मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं बनाया गया?
यह सवाल महागठबंधन के अंदर बैठे उन नेताओं के लिए भी चेतावनी है, जो खुद को नजरअंदाज महसूस कर रहे हैं।
2025 चुनाव का समीकरण क्या बदलेगा?
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए सभी पार्टियां अभी से अपनी रणनीति तैयार कर रही हैं। अगर हम पार्टी NDA के साथ गठबंधन करती है और वीआईपी पार्टी भी लौट आती है, तो एनडीए को नया सामाजिक आधार मिल सकता है।
तेजस्वी यादव अभी युवा और मुखर नेता जरूर हैं, लेकिन अगर उनके करीबी नेता ही विपक्ष में बैठने से इनकार करें, तो उनके नेतृत्व की स्वीकार्यता पर भी सवाल उठ सकते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम को दो नजरिए से देखा जा सकता है — एक, कि यह सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की राजनीति को मजबूत करने की कोशिश है। दूसरा, कि यह सिर्फ चुनावी लाभ और सीट बंटवारे का खेल है।
फिलहाल तो संतोष सुमन का कदम राजनीतिक शतरंज में एक चाल की तरह है। अब देखना यह होगा कि विपक्ष इसका जवाब किस तरह देता है। क्या तेजस्वी यादव अपने करीबी नेताओं को साथ बनाए रख पाएंगे? या एनडीए एक बार फिर जातिगत और राजनीतिक संतुलन बैठाकर गेम जीत जाएगा?

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