
भारत में लंबे समय से कुपोषण, गर्भवती महिलाओं की खराब स्वास्थ्य स्थिति और शिशु मृत्यु दर एक बड़ी समस्या रहे हैं। केंद्रीय और राज्य सरकारें इन मुद्दों को हल करने के लिए लगातार विभिन्न योजनाओं पर काम करती रही हैं। इन्हीं कार्यक्रमों में से एक है समेकित बाल विकास सेवा (ICDS), जो गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और छोटे बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण संबंधी सेवाएं प्रदान करती है। इस पूरी व्यवस्था का आधार आंगनबाड़ी सेविका और सहायिका हैं, जो ग्रामीण स्तर पर इन सेवाओं को प्रदान करती हैं।
हाल ही में सरकार ने इन आंगनबाड़ी कर्मचारियों के मानदेय में वृद्धि करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय उनके जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, न केवल उनके काम की सराहना है।
आंगनबाड़ी सेविकाओं व सहायिकाओं की भूमिका
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में छोटे-छोटे केंद्रों पर आंगनबाड़ी सेविकाएं और सहायिकाएं काम करती हैं। इसमें उनकी प्रमुख भूमिकाएँ शामिल हैं:
1. बच्चों की पोषण सुविधा: वे 0 से 6 वर्ष तक के बच्चों को स्वस्थ भोजन और सप्लीमेंट प्रदान करते हैं।
2. स्वास्थ्य सुविधाएँ गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं को स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता देना, टीकाकरण की जानकारी देना और आयरन-फोलिक एसिड की दवाइयाँ देना।
3. पूर्व-स्कूल शिक्षा— छोटे बच्चों को खेल-खेल में सीखने की प्रक्रिया में शामिल करना
4. स्वास्थ्य परीक्षण समय-समय पर बच्चों और महिलाओं की वजन और ऊँचाई की जाँच करके कुपोषण का पता लगाना
5. समुदाय से संबंध: गाँव या मोहल्ले में लोगों को शिक्षा, पोषण और स्वच्छता का महत्व बताना।
कुल मिलाकर, वे न केवल बच्चों और माताओं की देखभाल करते हैं, बल्कि समाज को बदलते हैं।
मानदेय वृद्धि का नया निर्णय
सरकार ने उनकी सेवाओं का सम्मान करते हुए उनका मानदेय बढ़ा दिया है।
- आंगनबाड़ी सेविका का मानदेय ₹7,000 से बढ़ाकर ₹9,000 कर दिया गया है।
- आंगनबाड़ी सहायिका का मानदेय ₹4,000 से बढ़ाकर ₹4,500 कर दिया गया है।
यह निर्णय दर्शाता है कि सरकार उनके कार्य को कितना महत्व देती है।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है?
1. वित्तीय सशक्तिकरण: सेवकों और सहायिकाओं की आय बढ़ने से उनका जीवन स्तर सुधरेगा।
2. उत्साह और आत्मविश्वास: जब मेहनत का उचित मूल्य मिलता है, कर्मचारी अधिक समर्पित होते हैं।
3. सेवाओं में सुधार— बेहतर आत्मविश्वास से वे बच्चों और महिलाओं को अधिक प्रभावी ढंग से सेवा दे सकेंगे।
4. सामाजिक आदर— यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि लोगों और सरकारों ने उनके काम को स्वीकार किया है।
2005 से अब तक सरकार के प्रयास
नवंबर 2005 के बाद से सरकार ने गर्भवती और बच्चों के पोषण को बेहतर बनाने के लिए बहुत कुछ किया है।
ICDS सेवाओं: पूरक पोषण, स्वास्थ्य जांच, टीकाकरण, स्वास्थ्य व पोषण शिक्षा, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का रेफरल शामिल हैं।
पोषण अभियान – कुपोषण मुक्त भारत की दिशा में निरंतर।
मातृ वंदना योजना – गर्भवती महिलाओं को आर्थिक सहायता।
बाल विकास कार्यक्रम – बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य को एक साथ जोड़ना।
इन सभी प्रयासों को जमीनी स्तर तक पहुँचाने का कार्य आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने पूरी निष्ठा से किया है।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की चुनौतियाँ
जबकि उनका काम बहुमूल्य है, उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है: मानदेय कम होना सीमित संसाधनों का उपयोग करना ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर लोग जागरूक नहीं हैं। समय पर भुगतान न करना इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए मानदेय बढ़ाना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
मानदेय वृद्धि का संभावित प्रभाव
1. बच्चों में कुपोषण दर कम होगी— पोषण संबंधी सेवाएँ देने में सेविकाएं अधिक समर्पित होंगी।
2. गर्भवती महिलाओं की सेहत सुधरेगी— समय पर पोषण और स्वास्थ्य सलाह मिलने से जटिलताएँ कम होंगी।
3. बच्चों की मृत्यु दर में कमी बच्चे स्वस्थ रहेंगे अगर वे संतुलित आहार और पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करेंगे।
4. महिलाओं का सशक्तिकरण आर्थिक रूप से सक्षम होने पर सेविकाएं समाज में स्वतंत्रता का प्रतीक बन जाएंगी।
5. लोगों की जागरूकता बढ़ेगी— लोग पोषण और स्वास्थ्य के महत्व को लेकर गंभीर हो जाएंगे।
सरकार से अपेक्षाएँ
लेकिन मानदेय में वृद्धि सराहनीय है, इसके साथ-साथ कुछ अतिरिक्त प्रक्रियाएं भी आवश्यक हैं: समय पर मानदेय का भुगतान करना कार्यशालाओं और प्रशिक्षण के माध्यम से सेविकाओं की क्षमता को बढ़ाना आंगनबाड़ी केंद्रों की इमारतों और सुविधाओं को नवीनतम बनाना। सहायिकाओं और सेविकाओं के लिए स्वास्थ्य बीमा और पेंशन कार्यक्रमों को लागू करना।
निष्कर्ष
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पोषण और स्वास्थ्य सुधार की कुंजी आंगनबाड़ी सेविकाएं और सहायिकाएं हैं। वे बच्चों को स्वस्थ भोजन देते हैं और अगली पीढ़ी को स्वस्थ और शिक्षित बनाते हैं। सरकार ने उनके पद को बढ़ाकर उनके योगदान का सम्मान किया है। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा, उनका जीवन स्तर सुधरेगा और समेकित बाल विकास सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।
इस फैसले से स्पष्ट होता है कि सरकार बच्चों और माताओं के स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है और महिलाओं के योगदान को महत्व देती है। यह अभियान भारत को एक स्वस्थ, कुपोषण रहित देश बनाने में एक बड़ी भूमिका निभा सकता है अगर आगे सुधारात्मक कदम उठाए जाएँ।
✍️ लेखक के बारे में
Sunny Mahto एक उभरते हुए ब्लॉगर हैं, जो शिक्षा, सरकारी योजनाओं (Sarkari Yojana), भर्ती (Jobs), और करंट न्यूज़ से जुड़े विषयों पर सरल और उपयोगी जानकारी लोगों तक पहुँचाते हैं। इनका उद्देश्य है कि बिहार और उत्तर प्रदेश के युवाओं व आम लोगों को सरकारी योजनाओं और नौकरियों की पूरी जानकारी एक ही जगह पर मिले।
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