
“जहां लोकतंत्र का चेहरा बाहुबली हो – वो है मोकामा!”
बिहार में छोटा सरकार के नाम से जानने वाले विधायक अनंत सिंह फिर से चर्चे में आ गये हैं आइए जानते हैं डिटेल में इनके बारे शुरू से जानकारी हासिल करेंगे
बिहार की राजनीति में अगर किसी विधानसभा क्षेत्र की पहचान बाहुबल, दबदबे और सियासी टकराव से होती है, तो वो है मोकामा। यह वही मोकामा है जो कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था, लेकिन पिछले तीन दशकों से यहां सिर्फ दो परिवारों का वर्चस्व रहा है – अनंत कुमार सिंह और सूरजभान सिंह। इस सीट पर हर चुनाव एक रोमांचक युद्ध बन जाता है, जहां मुद्दों से ज़्यादा चेहरों और छवियों की टक्कर होती है।
A से Z तक: मोकामा की राजनीति की पूरी कहानी
A – अनंत कुमार सिंह: नाम ही काफी है
अनंत कुमार सिंह उर्फ छोटे सरकार का नाम मोकामा की राजनीति में ऐसा है, जैसे रजनीकांत का साउथ सिनेमा में। बाहुबली छवि, जमीन से जुड़ाव और जनता के बीच पकड़ – यही तीन चीज़ों ने उन्हें मोकामा का ‘बेमुक़ाबला नेता’ बना दिया। उन्होंने जेडीयू से शुरुआत की और फिर निर्दलीय, बाद में राजद से जुड़े।
B – बनाम सूरजभान सिंह
वहीं दूसरी ओर हैं सूरजभान सिंह – एक और बाहुबली, एक और सियासी योद्धा। लोजपा से सांसद रहे, कैबिनेट मंत्री रहे, और मोकामा पर वर्षों तक उनका कब्ज़ा रहा। अब उनके परिवार के सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं और अनंत सिंह के परिवार से सीधी टक्कर देते हैं।
C – कांग्रेस का पुराना किला
सालों पहले तक मोकामा कांग्रेस का मज़बूत गढ़ हुआ करता था। लेकिन जैसे-जैसे राज्य में मंडल राजनीति और स्थानीय दबदबे का दौर आया, बाहुबलियों ने सत्ता की बागडोर संभाल ली।
D – दबदबे की राजनीति
मोकामा की राजनीति में विकास, शिक्षा या रोज़गार से ज़्यादा अहम है किसका “दबदबा” कायम है। यहां का मतदाता भी नेता के करिश्मे और ‘भाई साहब’ की छवि पर वोट करता है।
E – इमेज का खेल
अनंत सिंह को जनता का नेता माना जाता है – उनके समर्थक उन्हें ‘जनसेवक’ कहते हैं, जबकि विरोधी उन्हें ‘अपराधी’ कहते हैं। लेकिन चुनाव नतीजे हमेशा उनके पक्ष में रहे हैं।
⚔️ 2 परिवार, 3 दशक, 1 सीट – कौन है असली बॉस?
1985 से अब तक अगर आप मोकामा के चुनाव परिणाम देखेंगे तो साफ़ समझ आएगा कि यह सीट दो ही परिवारों के बीच घूमती रही है।
1995 सूरजभान सिंह लोजपा अनंत समर्थक सूरजभान
2005 अनंत सिंह जेडीयू – अनंत
2015 अनंत सिंह निर्दलीय लोजपा अनंत
2020 नीलम देवी (पत्नी अनंत सिंह) राजद – अनंत
आज की तारीख में नीलम देवी विधायक हैं, लेकिन अनंत सिंह की छाया हर फैसले पर हावी है। वहीं सूरजभान का परिवार फिर से वापसी की तैयारी में है।
F – FIR और केस: चुनाव का हिस्सा
दोनों परिवारों के नाम पर दर्जनों केस दर्ज हैं – हत्या, अपहरण, धमकी, संपत्ति विवाद। मगर इसके बावजूद जनता में पकड़ कमजोर नहीं हुई। कई बार जेल से चुनाव लड़कर भी जीत दर्ज की गई।
G – जनता की नजर में
स्थानीय लोग इन नेताओं को ‘भाई’ और ‘साहब’ जैसे संबोधनों से बुलाते हैं। उन्हें लगता है कि पुलिस या प्रशासन से ज़्यादा काम उनके नेता करवाते हैं – चाहे बिजली का कनेक्शन हो या सड़क बनवानी हो।
H – 2025 में कौन जीतेगा?
बिहार चुनाव 2025 में मोकामा फिर से चर्चा में रहेगा। क्या अनंत सिंह का परिवार जीत की हैट्रिक लगाएगा? या फिर सूरजभान सिंह की वापसी होगी? यह तो वक्त बताएगा, लेकिन मुकाबला ज़बरदस्त होगा।

मोकामा सिर्फ एक सीट नहीं, बाहुबल का प्रतीक है
जहां बिहार के कई हिस्सों में राजनीति अब मुद्दों पर शिफ्ट हो रही है, वहीं मोकामा आज भी दबंगई और छवि के इर्द-गिर्द घूमता है। जनता बदलाव चाहती है या भरोसे की पुरानी लकीर पर ही चलेगी – ये आने वाले चुनाव बताएंगे। पर इतना तय है कि मोकामा रहेगा सुर्खियों में, क्योंकि यहां राजनीति नहीं, अखाड़ा लगता है।