
Bihar के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने ट्वीट किया कि ओ अपने बिहार में शिक्षा को कहा से कहा तक लेकर आए आज के इस पोस्ट में हम जानेंगे कि नीतीश की सरकार आने से बिहार में शिक्षा की क्या बदलाव हुआ बने रहिए पोस्ट के लास्ट तक
उनका कहना कुछ इस प्रकार हैं
बिहार की शिक्षा व्यवस्था में एक ऐतिहासिक मोड़ आया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि शिक्षा केवल एक नीतिगत विषय नहीं, बल्कि हर बच्चे का मानव अधिकार है। 2005 से सत्ता संभालने के बाद से ही नीतीश सरकार लगातार शिक्षा के क्षेत्र में सुधार लाने में जुटी हुई है। हाल ही में उनकी तरफ से शिक्षा कर्मियों, रसोइयों, शारीरिक शिक्षा अनुदेशकों और अन्य सहयोगी स्टाफ के मानदेय में दोगुनी बढ़ोतरी की घोषणा की गई है, जो न सिर्फ सामाजिक न्याय की ओर एक बड़ा कदम है, बल्कि यह एक मानवीय अधिकार आधारित दृष्टिकोण को भी उजागर करता है।
1.शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता
वर्ष 2005 में जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली, उस समय बिहार की शिक्षा व्यवस्था संकट के दौर से गुजर रही थी। स्कूलों की संख्या कम थी, शिक्षक नहीं मिलते थे और आधारभूत संरचना लगभग ध्वस्त थी। शिक्षा का बजट भी केवल 4,366 करोड़ रुपये था। लेकिन आज, यह बजट 77,690 करोड़ रुपये तक पहुँच गया है — यानी लगभग 18 गुना वृद्धि।
यह केवल आंकड़ों की बात नहीं है, यह उस विजन की बात है जो शिक्षा को प्रत्येक नागरिक का अधिकार मानता है। शिक्षा का अधिकार संविधान का हिस्सा है, और बिहार सरकार इसे व्यवहारिक धरातल पर उतारने का काम कर रही है।
2.बड़ी संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति और आधारभूत ढांचे का विकास
सरकार द्वारा शिक्षकों की नियुक्ति, नए विद्यालय भवनों का निर्माण और स्कूलों में बिजली, शौचालय, फर्नीचर, पुस्तकालय जैसी सुविधाओं में भारी निवेश किया गया है। यह प्रयास इस दिशा में है कि शिक्षा सिर्फ उपस्थिति तक सीमित न रहे, बल्कि गुणवत्तापूर्ण और सम्मानजनक बने।
3.रसोइयों और रात्रि प्रहरियों को मिला सम्मान
सरकारी स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना (Mid-Day Meal Scheme) को सफल बनाने में रसोइयों की भूमिका अहम है। पहले इनका मानदेय मात्र 1,650 रुपये से 3,300 रुपये था, जिसे अब बढ़ाकर 5,000 रुपये कर दिया गया है। इसी तरह रात्रि प्रहरियों को भी अब 10,000 रुपये प्रतिमाह मिलेंगे।
यह निर्णय यह दर्शाता है कि सरकार केवल शिक्षकों पर ही नहीं, बल्कि उन सभी सहायक कर्मियों पर भी ध्यान दे रही है जो शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाते हैं।
4.शारीरिक शिक्षा और स्वास्थ्य अनुदेशकों को नई पहचान
शारीरिक शिक्षा और स्वास्थ्य आज बच्चों के समग्र विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन अनुदेशकों का पूर्व मानदेय 8,000 रुपये था, जिसे अब 16,000 रुपये कर दिया गया है। इसके साथ-साथ इनका वार्षिक वेतनवृद्धि 200 रुपये से बढ़ाकर 400 रुपये कर दी गई है।
यह फैसला न केवल आर्थिक रूप से इन्हें राहत देगा बल्कि उन्हें प्रेरित भी करेगा कि वे और बेहतर तरीके से विद्यार्थियों की सेवा करें।
5.कार्यरत कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि
वेतन बढ़ोतरी केवल पैसा नहीं है — यह सम्मान है, पहचान है, और समर्पण के लिए एक पुरस्कार है। रसोइयों, प्रहरियों, अनुदेशकों जैसे कर्मियों को लम्बे समय से उनकी मेहनत के हिसाब से वेतन नहीं मिल रहा था। अब जब सरकार ने इनका वेतन दोगुना करने का फैसला लिया है, तो यह न केवल इन परिवारों के जीवनस्तर में बदलाव लाएगा, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेगा।
6.एक समावेशी और मानवतावादी दृष्टिकोण
इस फैसले की सराहना इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि यह सामाजिक न्याय की भावना को मजबूत करता है। सरकार यह संदेश दे रही है कि किसी भी कर्मचारी का योगदान छोटा नहीं होता। हर कर्मचारी, चाहे वह शिक्षक हो या रसोइया, सभी शिक्षा व्यवस्था के स्तंभ हैं।
निर्णय एक मानवाधिकार-आधारित नीति की मिसाल है, जहाँ हर व्यक्ति को सम्मान और न्याय का हकदार माना जाता है।
7.शिक्षा के अधिकार की दिशा में एक ठोस कदम
संविधान का अनुच्छेद 21A सभी बच्चों को 6 से 14 वर्ष की आयु में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है। इस अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए जिस मेहनत और प्रतिबद्धता की आवश्यकता है, वह बिहार सरकार की इस नीति से झलकती है। सरकार यह दिखा रही है कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना केवल बिल्डिंग बनवाना नहीं, बल्कि हर उस हाथ को मजबूत करना है जो इसे सम्भालता है।

नीतीश कुमार का यह कदम न केवल एक प्रशासनिक निर्णय है, बल्कि यह एक मानवीय दृष्टिकोण का प्रतिबिंब है। एक सशक्त, शिक्षित और आत्मनिर्भर बिहार तभी बनेगा जब शिक्षक, रसोइया, प्रहरी, अनुदेशक — सभी को उनका हक और सम्मान मिलेगा।
सरकार ने दिखा दिया कि शिक्षा केवल विद्यालय तक सीमित नहीं, बल्कि यह हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है जो बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव रखता है। ऐसे में यह निर्णय आने वाले वर्षों में बिहार की शिक्षा व्यवस्था को और ऊँचाई पर ले जाएगा।